Friday, 11 December 2015

न्यायालय मांगे न्याय -" क्योंकि हम तो इसके भरोसे हैं और यह तो बेसहारो के लिए ही तो हैं. अब तो आप ने भी सुना ही होगा साहब!तो फिर सुनाईए ना संवैधानिक फैसला, क्योंकि अब तो न्यायालय भी मांग रहा हैं न्याय .




जिस देश का संविधान विश्व के लिए उदाहरण प्रतिक हैं और इसकी न्यायिक सुन्दरता तो वाकई में काबिले तारीफ हैं, शक की कोई गुंजाइश नहीं हैं क्योंकि यहां पर फैसला तो सबूतों के अधार पर ही सुनाया जाता हैं तभी तो सालों साल बीत जाते हैं एक ही केश के चक्कर में और हमारे न्यायिक संविधान में तो यह लिखा गया हैं कि भले ही गुनाहगार बच जाए लेकिन किसी बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए. अब आप ही बताइए कि यह हमारे न्यायालय के व्यवस्था की सुन्दरता नहीं है तो क्या हैं. आपके नजरिये से तो मुझे नहीं मालूम लेकिन मेरे ख्याल से आप इंकार भी नहीं कर सकते हैं क्योंकि यह बात में बयानबाजी कर के नहीं बल्कि लिखित तौर पर दे रहा हूं ताकि पुख्ता सबूत मिले और आप यकीन कर सको क्योंकि बयान तो यहां पर पलक झपकते ही बदल जाते हैं, चाहे पैसे के दम पर या फिर धमकी से लेकिन यह मुझे नहीं पता पर मैंने अक्सर कोर्ट - कचहरी में गवाहों को बिकते - बिलखते देखा हैं. खैर, छोङिये यह बात चलिए मुद्दे पर चर्चा करते हैं, हाँ! तो बात हो रही है संविधान के सुन्दरता की, बिना सबूतों व गवाहों के गुनाहगार को छोड़ देना भी तो सुन्दरता ही तो हैं और हो भी क्यों नहीं आखिर इन्हीं सब के वजह से तो हमें विदेशों में थोड़ी वाह वाही तो मिल रही हैं ना, क्योंकि विदेशियों के पास इतनी फुर्सत कहां हैं कि हमारी फाइल की फाइल और केश के केश का गिनती करें. अभी तक लाखों फाइलें लाइन में लगी हैं सालों से न्याय के लिए और पता नहीं कितने फाइल वाले गुहारकर्ता फाइल की तरह दब गए होंगे या फिर लापता हो गए होंगे क्योंकि यही तो हमारे न्यायिक व्यवस्था की सुन्दरता हैं. किसी ने सच ही कहा हैं कि सुन्दरता इंसान की सबसे बड़ी शत्रु हैं क्योंकि सुन्दरता के वजह से ही तो मान मर्यादा का ईमान, बेइमान बन जाता हैं और हमारी मासूमियत का तो जवाब नहीं हैं क्योंकि हम इसको ही अपनी महानता समझ कर सीना ताने घूमते हैं. न्याय की गरिमा को बरकरार रखने के लिए अब मर्यादित होना जरूरी हैं क्योंकि सौंदर्यीकरण तो बस आकर्षण का केंद्र हैं. वकीलों के टेबल पर फाइल तो न्यायाधीश के ऊपर तक फाइल और न्यायलय के कमरे में फाइल कुछ बिखरी हुई तो कुछ सजी हुई. कोई फैसले से खुश तो कोई रोता हुआ और कोई नए फाइल के साथ खङा न्याय के इंतजार में पर न्याय मिलेगा कैसे, क्योंकि जिस वकील के चैम्बर व कोर्ट - टाई सुन्दर हैं उन तक वो बिचारे फटे -  चिटे कपङे पहने लोग भला कैसे जाएं क्योंकि उनके पास तो सही सलामत जेब भी नहीं हैं तो भला पैसे से सजा फाइल कहां से लाएंगे. लेकिन वास्तव में सोचिये तो सुन्दरता तो यही है कि वो अनपढ़ - गरीब बेसहारे, न्यायालय पर विश्वास कर के  गमछे में रोटी बांधे खङे हैं इंसाफ के लिए लेकिन उनको भला कौन समझाएं और कैसे समझाएं की यहां तो न्यायालय ही न्याय की गुहार लगा रहा हैं और ऐसा हम समझाएं भी क्यों, क्योंकि हम गरीबों की कौन सुनेगा बिना पैसे के, लेकिन यह हमारा कोर्ट, हमारा न्यायालय और हमारा संविधान ही तो हैं जो कि सबका सुनता हैं बिना पैसे लिए और हम तो न्याय मांगेंगे ही क्योंकि हम तो इसके भरोसे हैं और यह तो बेसहारो के लिए ही तो हैं. अब तो आप ने भी सुना ही होगा साहब!तो फिर सुनाईए ना संवैधानिक फैसला, क्योंकि अब तो न्यायालय भी मांग रहा हैं न्याय .